17 साल बाद भी बावनखेड़ी हत्याकांड का खौफ जिंदा, मौत की सजा के बावजूद फांसी का इंतजार….

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अमरोहा। उत्तर प्रदेश के अमरोहा जिले के बावनखेड़ी गांव में अप्रैल 2008 में हुआ सामूहिक हत्याकांड आज भी प्रदेश के सबसे खौफनाक अपराधों में गिना जाता है। एक ही परिवार के सात लोगों की बेरहमी से हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस मामले में शबनम अली और उसके प्रेमी सलीम को अदालतों ने दोषी ठहराते हुए मौत की सजा सुनाई। निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक दोनों की सजा बरकरार रही। शबनम की ओर से राष्ट्रपति और उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के समक्ष दया याचिकाएं भी दाखिल की गईं, जिन्हें खारिज कर दिया गया। इसके बावजूद 17 साल गुजरने के बाद भी दोनों की फांसी की तारीख तय नहीं हो सकी है।

पुलिस की जांच के मुताबिक, वारदात वाली रात शबनम ने अपने परिवार के सदस्यों को खाने में नशीली दवा दे दी थी। परिवार के लोग बेहोश हो गए तो कथित तौर पर शबनम और सलीम ने मिलकर कुल्हाड़ी से हमला कर सात लोगों को मौत के घाट उतार दिया। मृतकों में शबनम के माता-पिता, दो भाई, भाभी, मौसेरी बहन और महज 10 महीने का भतीजा शामिल था। पुलिस जांच में हत्या के पीछे शबनम और सलीम के प्रेम संबंध तथा परिवार की कथित नाराजगी को वजह बताया गया था। अदालतों में चली लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद दोनों को मृत्युदंड मिला, लेकिन सजा पर अमल अब तक नहीं हो सका है।

मथुरा जेल में तैयारियां हुईं, मगर नहीं आया फांसी का दिन

मौत की सजा सुनाए जाने के बाद शबनम का नाम इस वजह से भी देशभर में चर्चा में रहा कि उसे स्वतंत्र भारत में फांसी पाने वाली पहली महिला बताया जाने लगा था। उत्तर प्रदेश में महिलाओं को फांसी देने के लिए मथुरा जेल में फांसीघर मौजूद है और मीडिया रिपोर्टों के दौरान वहां तैयारियों की खबरें भी सामने आईं। हालांकि, अब तक अमरोहा की सत्र अदालत की ओर से शबनम और सलीम के खिलाफ डेथ वारंट जारी नहीं किया गया है। यही वजह है कि दोनों अभी जेल में बंद हैं और अपनी अंतिम सजा के इंतजार में हैं।

सत्रह साल का लंबा वक्त गुजर चुका है, लेकिन बावनखेड़ी के उस घर की कहानी आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। ग्रामीण बताते हैं कि जिस घर में कभी परिवार की चहल-पहल हुआ करती थी, वहां उस खौफनाक रात के बाद सन्नाटा पसर गया। वक्त गुजरता गया, पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन सात लोगों की हत्या की वह रात गांव की स्मृतियों से मिट नहीं सकी। अदालतों से मौत की सजा पर मुहर लगने के बावजूद फांसी की तारीख का इंतजार इस चर्चित हत्याकांड को आज भी सुर्खियों में बनाए हुए है।

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